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बुधवार, 28 नवंबर 2018

श्राद्ध पक्ष

अनंत चतुर्दशी के बाद पूर्णिमा से शुरू होने वाला श्राद्घ पक्ष सर्वपितृ अमावस्या तक रहता है। इसमें पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक के बीच सोलह तिथियों के अनुसार श्राद्घ किया जाता है। अपने स्वर्गवासी पूर्वजों की शान्ति एवं मोक्ष के लिए किया जाने वाला दान एवं कर्म ही श्राद्ध कहलाता है। जिसने हमें जीवन दिया, उसके लिए, जिसने हमें जीवन देने वाले को जीवन दिया, उसके लिए तथा जो हमारे कुल एवं वंश का है, उसके लिए। इस प्रकार तीन पीढि़यों तक के लिए किया जाने वाला होम, पिण्डदान तथा तर्पण ही श्राद्धकर्म कहलाता हैं। ऐसी मान्यता है की माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और गोत्र का उच्चारण कर मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है, वह उनको प्राप्त हो जाता है। यदि अपने कर्मों के अनुसार उनको देव योनि प्राप्त होती है तो वह अमृत रूप में उनको प्राप्त होता है। जो श्रद्धा से दिया जाए, उसे श्राद्ध कहते हैं। श्रद्धा और मंत्र के मेल से जो विधि होती है, उसे श्राद्ध कहते हैं। विचारशील पुरुष को चाहिए कि संयमी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को एक दिन पूर्व ही निमंत्रण दे दें, परंतु श्राद्ध के दिन कोई तपस्वी ब्राह्मण घर पर पधारे तो उन्हें भी भोजन कराना चाहिए।
      
               जब पित्तर यह सुनते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित हो गया है तो वे एक-दूसरे का स्मरण करते हुए मनोनय रूप से श्राद्धस्थल पर उपस्थित हो जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन करते हैं। यह भी कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं तब पित्तर अपने पुत्र-पौत्रों के यहाँ आते हैं। शास्त्रों द्वारा जन्म से ही मनुष्य पर लिए तीन प्रकार के ऋण अर्थात कर्तव्य बतलाये गये हैं :-  देवऋण, ऋषिऋण तथा पितृऋण। अतः स्वाध्याय द्वारा ऋषिऋण से, यज्ञों द्वारा देवऋण से तथा संतानोत्पत्ति एवं श्राद्ध (तर्पण, पिण्डदान) द्वारा पितृऋण से मुक्ति पाने का रास्ता बतलाया गया है। इन तीनों ऋणों से मुक्ति पाये बिना व्यक्ति का पूर्ण विकास एवं कल्याण होना असंभव है।

                     श्राद्धकर्म में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है, जैसे :- जिन व्यक्तियों की सामान्य मृत्यु चतुर्दशी तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध केवल पितृपक्ष की त्रायोदशी अथवा अमावस्या को किया जाता है। जिन व्यक्तियों की अकाल-मृत्यु (दुर्घटना, सर्पदंश, हत्या, आत्महत्या आदि) हुई हो, उनका श्राद्ध केवल चतुर्दशी तिथि को ही किया जाता है। सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध केवल नवमी को ही किया जाता है। नवमी तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम है। जिसे माता नवमी भी कहते है। संन्यासी पितृगणों का श्राद्ध केवल द्वादशी को किया जाता है। पूर्णिमा को मृत्यु प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध केवल भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा अथवा आश्विन कृष्ण अमावस्या को किया जाता है। नाना-नानी का श्राद्ध केवल आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को किया जाता है। पितरों के श्राद्ध के लिए ‘गया’ को सर्वोत्तम माना गया है, इसे ‘तीर्थों का प्राण’ तथा ‘पाँचवा धाम’ भी कहते है। माता के श्राद्ध के लिए ‘काठियावाड़’ में ‘सिद्धपुर’ को अत्यन्त फलदायक माना गया है। इस स्थान को ‘मातृगया’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘गया’ में पिता का श्राद्ध करने से पितृऋण से तथा ‘सिद्धपुर’ (काठियावाड़) में माता का श्राद्ध करने से मातृऋण से सदा-सर्वदा के लिए मुक्ति प्राप्त होती है।। श्राद्धकर्म में श्रद्धा, शुद्धता, स्वच्छता एवं पवित्रता पर विशेष ध्यान देना चाहिए, इनके अभाव में श्राद्ध निष्फल हो जाता है। श्राद्धकर्म से पितरों को शांति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा प्रसन्न एवं तृप्त पितरों के आर्शीवाद से हमें सुख, समृद्धि, सौभाग्य, आरोग्य तथा आनन्द की प्राप्ति होती है।
श्राद्ध में वर्जित कार्य :-

तेल की मालिश नहीं करना चाहिए। इन दिनों में संभोग को वर्जित किया गया है। इन नियमों का पालन न करने पर हमें कई दु:खों को भोगना पड़ता है। इन दिनों खाने में चना, मसूर, काला जीरा, काले उड़द, काला नमक, राई, सरसों आदि वर्जित मानी गई है अत: खाने में इनका प्रयोग ना करें। आप भी अपने पितरो का श्राद्धकर्म अपनी भक्ति एव श्रदा से करे तथा उनकी कृपा प्राप्त करे ।


         
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शनिवार, 14 जनवरी 2012

शनि जयंती

जीवन का सम्पूर्ण सुख - दुःख , जय पराजय आदि विषय नवग्रहों पर आधारित है | इन्ही ग्रहों में शनि को संतुलन और न्याय का देवता माना जाता है | यह परम न्यायाधीश , कृपालु और जीव का परम हितेषी गृह है | शनि केवल उंहें ही पीड़ित करते है जो लोग अस्वाभाविक समता को आश्रय देते है और कुसंगति में फस कर बुरे कार्य करते है | और मांस -मदिरा और अस्वाभाविक क्रियाओ में समय व्यतीत करते है | शनि के कुपित होने से पहले व्यक्ति ने कही अन्याय और अनावश्यक विषमता का साथ दिया होगा | वास्तव में शनि एक मंगल कारक ग्रह है | शनि व्यक्ति का अहंकार चूर कर ईश्वर की शरण में ले जाना वाले आध्यात्मिक ग्रह है | जो एक तरह से हमारे जीवन में कठोर आचार्य की भूमिका निभाते है | भारतीय दर्शन और आध्यात्म के मुताबित ईश्वर ने नवग्रहों को स्रष्टि संचालन का दायित्व सौपा गया है | इसमें आठ ग्रहों को न्यायाधीश और एक ग्रह शनि को परम न्यायाधीश का काम दिया जाता है |
कही शुभ - कही अशुभ -:
यह भारतीय ज्योतिष की विडम्बना ही है की शनि को डरावना , क्रूर और पापी ग्रह बताया गया है | यह एक भ्रामक तथ्य है | शनि अमंगलकारी नहीं बल्कि मंगलकारी भी है | व्यक्ति को उसके कर्मानुसार अपनी शुभ द्रष्टियो के प्रभाव से ताज भी पहनते है और अशुभ स्थितियों में राजा को रंक बनाने से भी नहीं चुकते है | सौम्य ग्रह की द्रष्टि जहा जहा पड़ती है , वह भाव अच्छा फल देते है , जहा पर बैठते है वहा नुकसान जैसा ही माना जाता है | ऐसा शनि के मामले में विपरीत है , शनि का बैठना वृद्धि का सूचक माना जाता है | इसके आलावा शनि का अपने स्वयं के भाव षष्टम , अष्टम या द्वादश पर बैठना शुभ माना गया है | शनि मित्र राशियों में शुभ फल प्रदान करते है , परन्तु इन स्थानों बैठकर जहा जहा शनि की द्रष्टि पड़ती है , उन भावो से सम्बंधित कष्ट व्यक्तियों को भोगने पड़ते है | शनि की महादशा १९ वर्षो की होती है | इसकी ७वर्श छ: माह तक की अवधि को साठे साती कहते है | शनि ग्रह ३० वर्षो में अपनी परिक्रमा पूरी करते है | शनि की साठे साती तीन राशियों पर एक साथ प्रभाव डालती है | शनि ग्रह की महादशा में शनि के साथ साथ जब उसके मित्र ग्रहों का अन्तराल जैसे राहू - बुध - गुरु - शुक्र का समय आता है , तो जीवन में अच्छी घटनाए घटित होती है और जब शनि महादशा में केतु - सूर्य - मंगल - चन्द्रमा का अन्तराल आता है , तब व्यक्ति को ज्यादा कष्ट भोगने पड़ते है | शनि इस जन्म के पाप - पुण्य का भी फल देते है | वर्त्तमान समय में अच्छे आध्यात्मिक , वैदिक , दैविक और पौराणिक उपायों से शनि शांति करके या कराके अपने पूर्व जन्म के बुरे कर्मो के लिए क्षमा याचना की जा सकती है | इससे शनि ग्रह भी प्रसन्न होकर उन्हें सौभाग्य , सम्रद्धि और निरोगी काया का आशीर्वाद देते है | जाग्रत देव -:
कलियुग में तीन जाग्रत देव माने जाते है - शनिदेव , भैरव जी , हनुमानजी | इन तीनो की वंदना करने से हमें शीघ्र लाभ की प्राप्ति होती है | शनि पूजन सामान्य पूजन से अधिक फलदायी और जीवन के लिए महत्वपूर्ण होता है | किसी भी देवी - देवता या आराध्य की आराधना हम किसी न किसी मनोकामना की पूर्ति के उद्देश्य से करते है , परन्तु शनिदेव की पूजा में व्यक्ति अपनी पिछली भूलो की क्षमायाचना और वर्तमान के लिए सुधार का वचन देता है | इनकी पूजा आराधना हमेशा पूर्व जन्म के पाप , अपराधो की क्षमा प्रार्थना हेतु और इस जन्म के संकटों से बचने के लिए की जाती है | शनि की पूजा के माध्यम से हमारे सारे पाप कर्मो का प्रायश्चित होता है | शनि देव से सम्बंधित देवतागणों में भगवान शिव है | शनि देव ने ब्रम्हाजी की तपस्या करके उन्हें अपना आजीवन गुरु बनाया था | शनि भगवान युवा कल तक कृष्ण भगवान के भक्त भी रहे है | भगवान कृष्ण की भक्ति में वे इतने लीन रहते थे की उन्हें अपने आसपास का भी ध्यान नहीं रहता था | इसी कारण शनिदेव को अपनी पत्नी ध्वजिनी का श्राप प्राप्त हुआ शास्त्रों के अनुसार शनिदेव की सीधी द्रष्टि अशुभ कहलाती है | यही श्राप उन्हें अपनी पत्नी से मिला था | भगवान शिव और ब्रम्हा जी की आराधना करने से शनि की पीड़ा इसीलिए कम हो जाती है क्योकि वे शनि देव के आराध्य देव है | अपने कठिन समय में इन देवो की पूजा अर्चना अधिक फलदायी सिद्ध होती है | वास्तव में शनि देव तो कर्मयोग के पक्षधर है | कर्मशील व्यक्ति को विपरीत दशा भी प्रभावित नहीं कर पति है | कर्मशील व्यक्ति के लिए वे दयालु और कल्याणकारी देवता है |