लोकप्रिय पोस्ट

शनिवार, 14 जनवरी 2012

शनि जयंती

जीवन का सम्पूर्ण सुख - दुःख , जय पराजय आदि विषय नवग्रहों पर आधारित है | इन्ही ग्रहों में शनि को संतुलन और न्याय का देवता माना जाता है | यह परम न्यायाधीश , कृपालु और जीव का परम हितेषी गृह है | शनि केवल उंहें ही पीड़ित करते है जो लोग अस्वाभाविक समता को आश्रय देते है और कुसंगति में फस कर बुरे कार्य करते है | और मांस -मदिरा और अस्वाभाविक क्रियाओ में समय व्यतीत करते है | शनि के कुपित होने से पहले व्यक्ति ने कही अन्याय और अनावश्यक विषमता का साथ दिया होगा | वास्तव में शनि एक मंगल कारक ग्रह है | शनि व्यक्ति का अहंकार चूर कर ईश्वर की शरण में ले जाना वाले आध्यात्मिक ग्रह है | जो एक तरह से हमारे जीवन में कठोर आचार्य की भूमिका निभाते है | भारतीय दर्शन और आध्यात्म के मुताबित ईश्वर ने नवग्रहों को स्रष्टि संचालन का दायित्व सौपा गया है | इसमें आठ ग्रहों को न्यायाधीश और एक ग्रह शनि को परम न्यायाधीश का काम दिया जाता है |
कही शुभ - कही अशुभ -:
यह भारतीय ज्योतिष की विडम्बना ही है की शनि को डरावना , क्रूर और पापी ग्रह बताया गया है | यह एक भ्रामक तथ्य है | शनि अमंगलकारी नहीं बल्कि मंगलकारी भी है | व्यक्ति को उसके कर्मानुसार अपनी शुभ द्रष्टियो के प्रभाव से ताज भी पहनते है और अशुभ स्थितियों में राजा को रंक बनाने से भी नहीं चुकते है | सौम्य ग्रह की द्रष्टि जहा जहा पड़ती है , वह भाव अच्छा फल देते है , जहा पर बैठते है वहा नुकसान जैसा ही माना जाता है | ऐसा शनि के मामले में विपरीत है , शनि का बैठना वृद्धि का सूचक माना जाता है | इसके आलावा शनि का अपने स्वयं के भाव षष्टम , अष्टम या द्वादश पर बैठना शुभ माना गया है | शनि मित्र राशियों में शुभ फल प्रदान करते है , परन्तु इन स्थानों बैठकर जहा जहा शनि की द्रष्टि पड़ती है , उन भावो से सम्बंधित कष्ट व्यक्तियों को भोगने पड़ते है | शनि की महादशा १९ वर्षो की होती है | इसकी ७वर्श छ: माह तक की अवधि को साठे साती कहते है | शनि ग्रह ३० वर्षो में अपनी परिक्रमा पूरी करते है | शनि की साठे साती तीन राशियों पर एक साथ प्रभाव डालती है | शनि ग्रह की महादशा में शनि के साथ साथ जब उसके मित्र ग्रहों का अन्तराल जैसे राहू - बुध - गुरु - शुक्र का समय आता है , तो जीवन में अच्छी घटनाए घटित होती है और जब शनि महादशा में केतु - सूर्य - मंगल - चन्द्रमा का अन्तराल आता है , तब व्यक्ति को ज्यादा कष्ट भोगने पड़ते है | शनि इस जन्म के पाप - पुण्य का भी फल देते है | वर्त्तमान समय में अच्छे आध्यात्मिक , वैदिक , दैविक और पौराणिक उपायों से शनि शांति करके या कराके अपने पूर्व जन्म के बुरे कर्मो के लिए क्षमा याचना की जा सकती है | इससे शनि ग्रह भी प्रसन्न होकर उन्हें सौभाग्य , सम्रद्धि और निरोगी काया का आशीर्वाद देते है | जाग्रत देव -:
कलियुग में तीन जाग्रत देव माने जाते है - शनिदेव , भैरव जी , हनुमानजी | इन तीनो की वंदना करने से हमें शीघ्र लाभ की प्राप्ति होती है | शनि पूजन सामान्य पूजन से अधिक फलदायी और जीवन के लिए महत्वपूर्ण होता है | किसी भी देवी - देवता या आराध्य की आराधना हम किसी न किसी मनोकामना की पूर्ति के उद्देश्य से करते है , परन्तु शनिदेव की पूजा में व्यक्ति अपनी पिछली भूलो की क्षमायाचना और वर्तमान के लिए सुधार का वचन देता है | इनकी पूजा आराधना हमेशा पूर्व जन्म के पाप , अपराधो की क्षमा प्रार्थना हेतु और इस जन्म के संकटों से बचने के लिए की जाती है | शनि की पूजा के माध्यम से हमारे सारे पाप कर्मो का प्रायश्चित होता है | शनि देव से सम्बंधित देवतागणों में भगवान शिव है | शनि देव ने ब्रम्हाजी की तपस्या करके उन्हें अपना आजीवन गुरु बनाया था | शनि भगवान युवा कल तक कृष्ण भगवान के भक्त भी रहे है | भगवान कृष्ण की भक्ति में वे इतने लीन रहते थे की उन्हें अपने आसपास का भी ध्यान नहीं रहता था | इसी कारण शनिदेव को अपनी पत्नी ध्वजिनी का श्राप प्राप्त हुआ शास्त्रों के अनुसार शनिदेव की सीधी द्रष्टि अशुभ कहलाती है | यही श्राप उन्हें अपनी पत्नी से मिला था | भगवान शिव और ब्रम्हा जी की आराधना करने से शनि की पीड़ा इसीलिए कम हो जाती है क्योकि वे शनि देव के आराध्य देव है | अपने कठिन समय में इन देवो की पूजा अर्चना अधिक फलदायी सिद्ध होती है | वास्तव में शनि देव तो कर्मयोग के पक्षधर है | कर्मशील व्यक्ति को विपरीत दशा भी प्रभावित नहीं कर पति है | कर्मशील व्यक्ति के लिए वे दयालु और कल्याणकारी देवता है |